आज फिर स्याहि का रंग कागज पर उतर आया

आज फिर स्याहि का रंग कागज़ पर उतर आया,
जब उसका ख़्याल मेरे दिल में उभर आया।

झुकी नजरों में जो उसका चेहरा नजर आता था
दिल में कही चिराग सा जल जाता था।
नजरे ना मिलें ये गम ना था,
उसकी पलको में ये सारा समां सिमट जाता था।

पर वक़्त ने कैसा ख़ेल हमें खिलया, की हमने बस यादों का समां जलाय।
वो यहाँ नहीं पर नजरें उसका इन्तजार किया करती हैं
दूर होने की सजा आँसुओं में अदा करती हैं।

है ख़ुदा तूने कैसा रँगमंच है रचाया
इस जुदाई के आलम में तूने क्यो तन्हा संसार बनाया।
आज फिर इन तनहाइयों ने मेरे दिल को है रूलाया
आज फिर स्याहि का रंग कागज पर उतर आया।

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