ना जाने वो क्या बात थी

ख़ामोशी यो के हवाले हो गई वो एक रात थी ,
उस रात गुम हुई  वो बात थी,
ना जाने वो क्या बात थी ,
ना जाने वो क्या बात थी,

उस रात ना मेरी कोई मंजिल थी,  ना कोई रास्ता ,
ना दर्द था, ना कोई असारता,
चार लोगो के कंधो पर  निकली वो बारात थी,
कब्रिस्ता के रस्ते  पर गूंजी एक आवाज थी,
ना जाने वो क्या बात थी ,
ना जाने वो क्या बात थी,

बुझी हुई चिंगारियों में सुलगती हुई वो आग थी ,
शायद वो सोलो की बरसात थी ,
या फिर मेरे दिल से निकली  फरियाद  थी,
मेरी खमोशी यो के साथ खामोश  हो गई वो बात थी ,
ना जाने वो क्या बात थी ,
ना जाने वो क्या बात थी,

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